एक वैध विवाह अनुबंध के आधार पर पत्नी अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार होती है, भले ही वह स्वयं संपन्न हो या अलग धर्म की हो, बशर्ते कि उसने स्वयं को वास्तविक रूप से या विधिक रूप से (constructively) पति के अधीन सौंप दिया हो (अनु. 74)। भरण-पोषण में प्रथा के अनुसार भोजन, वस्त्र, आवास और संबंधित मदें जैसे चिकित्सा उपचार और सेवा शामिल हैं (अनु. 75)।
भरण-पोषण का निर्धारण पति की आर्थिक स्थिति — चाहे वह सुगम हो या कठिन — के अनुसार किया जाता है, पत्नी की परिस्थिति पर ध्यान दिए बिना, किंतु यह उसके लिए पर्याप्त न्यूनतम से कम नहीं होगा (अनु. 76)। पत्नी का भरण-पोषण उस तारीख से पति पर ऋण (debt) बन जाता है जिस दिन से वह देय होने पर भी भुगतान करने से इनकार करता है, और यह ऋण केवल भुगतान या उन्मोचन (release) से ही समाप्त होता है (अनु. 78)। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश तत्काल प्रवर्तनीय अंतरिम भरण-पोषण का आदेश दे सकता है (अनु. 79)।
यदि उपस्थित पति उसका भरण-पोषण करने से इनकार करता है, उसके पास कोई प्रत्यक्ष संपत्ति नहीं है, और उसकी दिवालियापन (insolvency) भी सिद्ध नहीं है, तो पत्नी तलाक की माँग कर सकती है, और न्यायाधीश तत्काल तलाक दिला देगा; पति देय भरण-पोषण का भुगतान करके इससे बच सकता है (अनु. 120)।
यह सामान्य कानूनी जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए सलाह हेतु, कुवैत में लाइसेंस प्राप्त वकील से परामर्श करें।