द्विपक्षीय (synallagmatic) अनुबंधों में, यदि कोई एक पक्ष देय होने पर और डिफॉल्ट में रखे जाने के बाद अपना दायित्व पूरा करने में विफल रहता है, तो दूसरा पक्ष — यदि वह अनुबंध बनाए रखना नहीं चाहता — न्यायालय से अनुबंध का विखंडन (rescission) माँग सकता है, जहाँ उचित हो वहाँ क्षतिपूर्ति सहित, बशर्ते कि विखंडन माँगने वाला पक्ष स्वयं अपने दायित्वों में डिफॉल्ट में न हो (अनु. 209)। विखंडन के अनुरोध पर न्यायालय परिस्थितियाँ आवश्यक होने पर देनदार को मोहलत दे सकता है, और यदि अपूर्ण दायित्व समग्र दायित्वों की तुलना में नगण्य हो तो विखंडन से इनकार कर सकता है (अनु. 209)।
निष्पादन रोकने के संदर्भ में, द्विपक्षीय अनुबंधों में, जहाँ पारस्परिक दायित्व देय हों, प्रत्येक पक्ष अपना निष्पादन रोक सकता है यदि दूसरे पक्ष ने निष्पादन नहीं किया (अनिष्पादन का प्रतिवाद / defense of non-performance), जब तक कि अन्यथा सहमत न हो या प्रथा द्वारा अपेक्षित न हो (अनु. 219)।
यदि अनुबंध का विखंडन होता है तो उसे कभी अस्तित्व में न आया हुआ माना जाता है, और पक्षों को अनुबंध-पूर्व की स्थिति में पुनर्स्थापित किया जाता है; यदि कोई पक्ष दूसरे को पुनर्स्थापित करने में असमर्थ हो, तो समकक्ष का आदेश दिया जा सकता है (अनु. 211)। ध्यान रहे कि अनुबंध पक्षों का कानून है, इसलिए कोई भी पक्ष एकतरफा इसे अस्वीकार नहीं कर सकता (अनु. 196)।
यह सामान्य कानूनी जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए सलाह हेतु, कुवैत में लाइसेंस प्राप्त वकील से परामर्श करें।