वैध विवाह अनुबंध पर पत्नी को महर देय होता है (अनुच्छेद 52), और इसकी कोई न्यूनतम या अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं है (अनुच्छेद 53)। कोई भी वस्तु जो विधिपूर्वक दायित्व का विषय बन सकती है — चाहे वह धन हो, कार्य हो, या कोई लाभ हो — महर के रूप में मान्य हो सकती है, जब तक वह पति के अधिकार के विरुद्ध न हो (अनुच्छेद 54)। यदि महर का उल्लेख न किया गया हो या उल्लेख अमान्य हो, तो समतुल्य महर (महर-उल-मिस्ल) देय होगा (अनुच्छेद 55)।
वास्तविक रूप से विवाह संपन्न होने पर, वैध एकांतवास (खलवा) पर, अथवा किसी एक पक्ष की मृत्यु पर पूरा महर सुनिश्चित हो जाता है (अनुच्छेद 61)।
यदि विवाह संपन्न होने या वैध एकांतवास से पूर्व पत्नी को तलाक दिया जाए, तो वह निर्धारित महर के आधे की अधिकारी होती है; यदि उसे आधे से अधिक प्राप्त हो चुका हो तो पति अधिशेष वापस ले सकता है (अनुच्छेद 63)। यदि महर निर्धारित न हुआ हो, तो वह न्यायाधीश द्वारा निर्धारित उपहार (मुत'आ) की अधिकारी होती है, जो समतुल्य महर के आधे से अधिक नहीं होगा (अनुच्छेद 64)। यदि विवाह संपन्न होने या वैध एकांतवास से पूर्व पत्नी के कारण विच्छेद हो, तो संपूर्ण महर या उपहार का अधिकार समाप्त हो जाता है (अनुच्छेद 65)।
यह सामान्य कानूनी जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए सलाह हेतु, कुवैत में लाइसेंस प्राप्त वकील से परामर्श करें।